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प्रसिद्ध चेरो राजा
सत्रहवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में दक्षिण बिहार में चेरो राजा सबसे
प्रभावशाली थे।
भगवंत राय (१६१३-१६३०)
एक दिलेर योद्धा था जिसने मुगलों से क्षेत्र छीनकर राज्य स्थापित किया था।
अगले चेरो राजा अनंत राय (१६३०-१६६१)
ने लंबे समय तक राज किया। उसका राज्यकाल संग्रामशील रहा क्योंकि उसे मुगलों
के आक्रमणों का सामना करना पड़ा।
मेदिनी राय (१६६२-१६७४)
ने केवल
१३
साल राज किया,
लेकिन वह सबसे अधिक विख्यात चेरो राजा है। वह बड़ा ही न्यायप्रिय था और अपनी
प्रजा से बहुत कम कर वसूलता था। पलामू के किलों में से पुराने किले का
निर्माण इसी राजा ने करवाया था।
मेदिनी राय के बाद प्रताप राय
(१६७५-१६८१)
का राज्यकाल शुरू हुआ। उसने पलामू के दूसरे किले का निर्माण कार्य आरंभ
करवाया,
लेकिन वह किले को पूरा नहीं कर सका। आज भी किला बनाने के लिए लाए गए पत्थरों
का ढेर और अपूर्ण किले के हिस्सों का खंडहर पलामू के जंगलों में विद्यमान
है।
पलामू के किले
जब चेरो राज्य उत्कर्ष पर था,
पलामू एक अच्छी-खासी नगरी थी। उसमें अनेक भव्य बाजार थे और उसकी रक्षा के लिए
दो मजबूत किले थे। ये किले ईंट-पत्थर के बने थे। उनके डेढ़ मीटर चौड़े बाहरी
दीवारों में जगह-जगह तोप के गोलों के निशान हैं। नए किले में सुंदर
नक्काशीवाला बड़ा फाटक था जिसे नागपुरी द्वार कहते हैं। दोनों किलों में गहरे
कुंए थे,
जिससे किले में शरण ली हुई सेना को पानी की कमी नहीं होती थी। किले के बगल से
ओरंगा नदी बहती थी और किले के चारों ओर ऊंची पहाड़ियां और घने जंगल थे।
१८५७
में पलामू
सन
१८५७
की क्रांति के समय
पलामू में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक सशस्त्र संग्राम छिड़े थे। पलामू की
बगावत सच्चे अर्थ में राष्ट्रीय आंदोलन थी क्योंकि उसमें आम प्रजा ही नहीं
राजा,
सामंत और जमींदार भी शामिल हुए थे। यह संग्राम
सन
१८५८
तक चलता रहा। उसमें चेरो,
बोगता और खरवार जनजाति के लोगों ने खुलकर हिस्सा लिया।
संरक्षण का इतिहास
पलामू में वैज्ञानिक संरक्षण प्रयासों का इतिहास काफी लंबा है। देश में बाघों
की गणना पहली बार पलामू में ही सन १९३२ को हुई थी।
प्रथम प्रबंध
योजना
पलामू की प्रथम प्रबंध योजना (१९७४-७५ से १९७८-७९) भारतीय वन सेवा के श्री बी. एन. सिन्हा ने तैयार
की। आप उस समय रांची कार्यालय में दक्षिणी अंचल के योजना अधिकारी के पद पर
कार्य कर रहे थे।
इस योजना के प्रमुख उद्देश्य थे जल-स्रोतों का विकास, अवैध शिकार की रोकथाम,
जंगल में मवेशियों की चराई नियंत्रित करना, अग्नि सुरक्षा प्रबंध और आरक्ष के
लिए बेहतर संरचनात्मक सुविधाएं प्राप्त करना।
द्वितीय प्रबंध योजना
यह श्री आर. सी. सहाय,
तत्कालीन क्षेत्र निदेशक, पलामू आरक्ष, द्वारा तैयार की गई। इसकी
कालावधि १९८७-८८ से १९९६-९७ तक थी।
इस योजना के
उद्देश्यों में शामिल थे, वैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिकीय
संतुलन हेतु बाघ और अन्य वन्य जंतुओं और आरक्ष के पेड़-पौधों
की उपयुक्त संख्या बनाए रखना।
इस योजना के दौरान
आरक्ष में चौमुखी प्रगति देखी गई। पानी के मामले में आरक्ष लगभग आत्मनिर्भर
हो गया। कोर क्षेत्र में चराई और मानव-जनित आग को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया
गया।
जहां भी खरपतवार हटाए गए, वहां साल और खैर का सफल पुनरुत्पादन हुआ। जंगली
जानवरों की संख्या भी बढ़ी।
पालतू पशुओं के
टीकाकरण पर काफी ध्यान दिया गया, विशेषकर मुंह-खुर रोग के विरुद्ध। इसके कारण
इस भयंकर बीमारी के कारण गौरों के मरने की घटनाएं नियंत्रित हुईं।
शाकाहारी प्राणियों
और बाघ की गणना नियमित रूप से होती रही।
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